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कहीं आपके पास डुप्लिकेट पश्मीना शॉल तो नहीं, जानिए इसके बारे में सबकुछ

Renu Chouhan | Dec 28, 2016, 14:51 IST
कहीं आपके पास डुप्लिकेट पश्मीना शॉल तो नहीं, जानिए इसके बारे में सबकुछ
Sharmila Tagore for Ahujasons Shawls
सर्दियां आते ही वुलन खरीदने की तैयारी शूरू हो जाती है. अगर अपने किसी खास को वुलन में से कुछ गिफ्ट करना हो तो सबसे पहले दिमाग में आती है शॉल, खासकर पशमीना शॉल. क्योंकि सीधा कश्मीर से आया ये वो फैब्रिक है जो अपने मुलायम टेक्सचर के लिए जाना जाता है. इसीलिए Fashion101.in आपको बता रहा है पशमीना से जुड़ी ऐसी बातें, जो शायद आपको न पता हो. भारत के हर एक राज्य की पहचान हैं ये जूलरी!
कैसे मिला नाम?
पशमीना, कश्मीरी ऊन के नाम से पॉपुलर ये शॉल खासकर कश्मीर में मिलती है. इसे ये नाम पार्सियन शब्द पश्म से मिला, जो भेड़ की ऊन, शहतूश (पार्शियन में इसे किंग फैब्रिक कहा जाता है) और कॉटन जैसे पहने जाने वाले फाइबर्स के लिए इस्तेमाल किया जाता था. कश्मीरी भाषा में पशमीना शब्द का मतलब होता है 'सॉफ्ट गोल्ड'. ठीक ऐसे ही शॉल भी एक इंडो-पार्सियन शब्द है जो शाल से बना है, इसका मतलब है फाइन ऊनी फैब्रिक जो ड्रेप के लिए इस्तेमाल होता हो. कशीदा - कश्मीर की वादियों से फैशन रैंप तक

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    कब से हुई शुरूआत?
    अफगानियों के समय यानि तीसरी ईसा पूर्व शताब्दी और ग्यारवी सदी के बीच कश्मीर की हाथों से बनीं शॉलों का ज़िक्र किया गया है. हालांकि, पशमीना इंडस्ट्री की शुरूआत 15वीं शताब्दी के दौरान हुई यानि Zayn-ul-Abidin के समय, ये वो शख्स है जो सेंट्रल एशिया के पशमीना वीवर्स को दुनिया के सामने लेकर आए.  इन 4 बेहतरीन हैंडलूम्स से खुद को ना रखें दूर   
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    कैसे बनती है पशमीना?
    पशमीना शॉल हाथों और मशीनों दोनों से बनाई जाती है, लेकिन सबसे बेहतर हाथों से बनी पशमीना शॉल होती है. एक शॉल में कम-से-कम तीन बकरों की ऊन का इस्तेमाल होता है और हर बकरे से लगभग 80 ग्राम अच्छी ऊन मिल जाती है. पशमीना के लिए इन ऊनों को चरखे के ज़रिए हाथों से ही काता जाता है. ये काम काफी मुश्किल और थकाने वाला होता है, इसीलिए ऊन कोई अनुभवी कारीगर ही कात सकता है. इसीलिए पशमीना शॉल पीढ़ी दर पीढ़ी बनाई जाती है क्योंकि इन कारीगरों को ज़्यादा अनुभव होता है. इसे कातने के आलावा इसे डाइ करने में भी उतनी ही मेहनत, समय और अनुभव लगता है. इस शॉल को इको-फ्रेंडली बनाने के लिए सिर्फ नैचुरल रंगों का इस्तेमाल किया जाता है. सिर्फ शॉल ही नहीं बल्कि स्टोल, स्वेटर, स्क्राव्स, मफलर और कंबल, सब कुछ बनाने का तरीका एक ही है. खुद के लिए डिज़ाइनिंग? तो पहले जानें फैब्रिक्स से जुड़ी 5 बातें

     
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    किससे और कहां बनती है पशमीना?
    ये कश्मीरी ऊन तीन तरह की बकरियों और बकरों की ऊनों से बनती है. जिनके नाम हैं चांगथांगी या कश्मीरी पशमीना बकरा, चेगु और च्यांग्रा या नेपाली पशमीना बकरा. बकरों से लगभग 300 से 400 ग्राम ऊन वहीं, बकरियों से लगभग 200 से 250 ग्राम ऊन मिलती है. असली पशमीना कश्मीर और Nepal में ही बनती हैं. कश्मीर और Nepal जैसे हिमालया के पास वाली जगहों के अलावा इन बकरों की ब्रीड China, Mongolia, Australia, United States, India (खासकर Ladakh) में भी पाई जाती है. 
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    इतने प्रकार की होती है पशमीना
    अब पशमीना एक या दो नहीं बल्कि कई तरह की होती हैं. जैसे ‘वॉटर पशमीना’ ये ट्रांसलूसेंट होने की वजह से काफी ग्लैमरस लगती है. ये पशमीना दो रंगों के धागों से बनती है और हर एक साइड शेड अलग होता है.
     
    बैम्बू पशमीना, पॉपुलर लाइटवेट पशमीना की ये एक और वेराइटी है. ये 80% बैम्बू फाइबर और 20% कैश्मीर ऊन से बनती है. इसकी खास बात है ये पहनने पर काफी सिल्की लगती है.
     
    एक और प्रकार की पशमीना होती है जैक्वार्ड पशमीना, जो काफी सस्ती लेकिन पॉपुलर होती है. इस पशमीना में बाकि फैब्रिक जैसे सिल्क मिक्स होता है. कश्मीर की फैशनेबल कहानी – जन्नत से आया फैशन का तोहफा  
     

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