मास्टरजी को मिला मेकोवर

मास्टरजी को मिला मेकोवर

मैं हमेशा से उन बच्चों में से थी जो अपेन कपड़े खुद पसंद करते थे. ‘Rangeela’ में Urmila Matondkar को देखने क बाद, मुझे भी उसी तरह की घेरदार मिनी स्क्रट चाहिए थी. तो मेरी मम्मी मुझे एक टेलर के पास ले गईं, जिसने मेरे लिए वो बनाया. ये मेरी पहली और सबसे पुरानी याद है एक चश्में वाले अंकल से बातचीत की, जिन्होंने अपने गले में इंची टेप पहना हुआ था, हाथ में एक फूशिया चॉक थी जिसे देखकर मैं बहुत एक्साइटेड हो गई. जब मैंने वो सिला हुआ कपड़ा देखा, मैं इतनी खुश हुई कि मैंने उस स्कर्ट को उसके आखिरी दम तक पहना. वो खुशी मेरे लिए बहुत बड़ी थी. तब से मेरा और मेरे दर्ज़ी का बहुत खट्टा-मीठा रिश्ता रहा है. अपने पहल टेलर को अंकल फिर भैया और आखिर में उसके नाम से बुलाने तक, मेरे दर्ज़ी के साथ मेरा रिश्ता बहुत अनोखा है. वही थे जिन पर हक जताकर मैं शिकायत करती थी जब वो मेरी कोई सलवार-कमीज़ खराब कर देते थे. लेकिन वो पहले डिज़ानन भी थे जिनके बनाए कपड़े पहनने का मैं बेसब्री से इंतज़ार करती थी.
 
एक नए शहर में जाने के बाद एक अच्छा टेलर ढूंढने की मशक्कत वास्तविक थी, और जब मैंने ये कर दिखाया, मुझे ऐसा लगा कि मैंने जंग जीत ली हो. मुंबई में राजू टेलर और नौएडा में पहनावा मेरे पसंदीदा रहे हैं. जब भी मैंने उन्हें कोई कपड़ा और रफ स्केचेज़ दिए हैं, उन्होंने पूरी कोशिश की है उससे एक खूबसूरत गार्मेंट बनाने की. . मेरी पहली LBD भी उन्होंने ही सिली थी, यहां तक की जो लहंगा मैंने अपनी बहन की शादी पर पहना था वो भी आधा डिज़ाइनर और आधा ऐल्केमिस्ट था. पर कहीं ना कहीं बड़े डिज़ाइनर्स, लक्ज़री टेलरिंग, ऑनलाइन शॉपिंग और मॉल्स में दुकानों की भीड़ के बीच अपने मोहल्ले वाले दर्ज़ी के साथ वो रिश्ता कहीं गुम सा हो गया है.
 
पिछले कुछ समय में टेलर के रोल में काफी बदलाव आए हैं. शहरी लोग अब दर्ज़ी से कपड़े सिलवाने के झमेले में नहीं पड़ना चाहते हैं. एक वजह है कीमत और दूसरी वजह है सहजता. अगर आपको आसानी से अपना स्टाइल और साइज़, ऑनलाइन या पास के किसी मॉल में मिल जाएगा, तो भला आप कपड़ा खरीदकर, फिर एक अच्छी स्टाइल ढूंढने और उसके बनने का लंबा इंतज़ार क्यों करेंगे?
 
बदलती ज़रूरतों और मांगों के हिसाब से ये मास्टरजी लोग भी बदल गए हैं – कुछ इंडिया की तेज़ी से बढ़ती कपड़ों की इंडस्ट्री में काम करने लगे हैं, कुछ शहरों में फैशन डिज़ाइनर्स से हाथ मिला लेते हैं. कुछ ने अपनी सर्विसेज़ को मॉडर्नाइज़ करते हुए आपके घर से ही पिकप और डेलिवरी की सुविधा देने लगे हैं, जहां वो अपनी गाड़ीयां और स्मार्टफोन्स लेकर आते हैं.
 
मुझे ये देखकर अच्छा लगता है कि अभी भी कुछ ऐसे दर्ज़ी हैं जो भीड़-भाड़ वाले बाज़ारों में, हैंगरों पर टंगी सलवार-कमीज़ों की कतार के आगे, अपनी सिलाई मशीन पर बैठकर पुराने तरीकों से काम करते हैं. जब जींस में सजी-धजी कॉलेज गर्ल्स और साड़ियों में सजी मिडिल-एज्ड औरतें कतार में खड़ी होकर अपनी बारी का इंतज़ार करती हैं, आप देखेंगी की दर्ज़ी नई स्टाइल का  बैकलेस ब्लाउज़ सिल रहा होगा.
 
दर्ज़ी के पास अब नए कपड़े हैं.
 

 

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