क्यों मुझे सूट से ज़्यादा शेरवानी पसंद है

क्यों मुझे सूट से ज़्यादा शेरवानी पसंद है

मैं हमेशा से इंडियन कपड़ों के ग्रेसफुल सिलुएट्स का मुरीद रहा हूं. इसके पीछे की परंपरा और इनसे जुड़ी विरासत, हर चीज़ मुझे काफी प्रभावित करती है. आज के बेशुमार ट्रेंड्स के बीच हमारे पुरखों के दिनों के हैंड-टेलर्ड पीसेज़ कहीं गुम से हो गए हैं. गुम ना सही पर इन्हें ट्विस्ट कर के नया रूप तो ज़रूर दे दिया गया है.
 
पर फिर भी क्लासिक शेरवानी के लिए मेरा लगाव और प्यार आज भी बरकरार है. इसने समय के सारे इम्तेहानों को सहा है और बावजूद इसके इतने सालों बाद भी इसका चार्म बरकरार है.
जहां क तरफ पश्चिमी रनवे पर दिखने वाले ट्रेंड्स आज भी हमारे यहां लोगों के लिए लक्ज़री की परिभाषा है, वहीं दूसरी तरफ हमारे यहां के दर्ज़ी जो एक पर्फेक्ट शेरवानी बनाने में कई हफ्ते बिताते हैं, अकसर ये सोचते हैं कि आखिर इंडियन मर्दों के लिए लक्ज़री का क्या मतलब है?
 
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मेरे लिए इंडियन कुट्योर और लक्ज़री की असल परिभाषा एक शानदार हाथ से बनी शेरवानी में है. दूसरे किसी तरह प्यार की तरह इंडियन कुट्योर की प्रति मेरा प्यार पूरी तरह से विवेकशील नहीं है. इसका ज़्यादातर हिस्सा मेरी पैदाइश और परवरिश से है और बाकी प्रैक्टिकल है. जब भी ऐसा कोई मौका आता है, जब मेरे लिए तैयार होना ज़रूरी होता है, फिर चाहे वो कोई शादी हो या फॉर्मल रीयूनियन, एक शानदार शेरवानी हमेशा सूट से ऊपर ही रहेगी मेरे लिए. चलिए मैं आपको इसकी वजहें भी गिनवा देता हूं. (और ये बेतुके नहीं होंगे ये मेरा वादा है.)
 

 

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